बस्तर की असली आवाज़ ‘माटी’ बड़े पर्दे पर रिलीज़
1000 से अधिक ग्रामीणों ने खुद को कहानी का बनाया हिस्सा

जगदलपुर। बस्तर की जमीन पर जन्मी कहानियां अक्सर सिर्फ दंतकथाओं और रिपोर्टों में सीमित रह जाती थीं, लेकिन इस बार बस्तर ने खुद अपनी कहानी कहने का फैसला किया है और उसी का परिणाम है छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘माटी’, जो शुक्रवार को प्रदेशभर में रिलीज होते ही चर्चा का केंद्र बन गई। जहां ज्यादातर फिल्में बस्तर को संघर्ष या हिंसा की एकतरफा तस्वीर में बांध देती हैं, वहीं ‘माटी’ पहली बार बस्तर को उसके अपने नजरिये से दुनिया के सामने रखती है उसके लोग, उसकी संस्कृति, उसकी संवेदनाएं और उसके भीतर पलती उम्मीदें। प्रदेशभर में रिलीज हुई ‘माटी’ का पहला शो जगदलपुर में पत्रकारों के लिए खास तौर पर रखा गया। लेकिन इस शो की सबसे बड़ी खासियत फिल्म नहीं, बल्कि वह नजरिया था जिसे पत्रकारों ने स्क्रीन पर देखा एक ऐसा बस्तर, जिसे वे रोज़ कवर तो करते हैं, पर पहली बार इतने जीवंत रूप में महसूस कर पाए। फिल्म मनोरंजन की परिभाषा को तोड़ते हुए बस्तर की मिट्टी में रची-बसी कहानियों को कैद करती है। घने जंगलों की सांसें, घाटियों में फैली खामोशी, गांवों की सरलता, और नक्सलवाद की छाया के बीच भी जीवन की जिद्द। ‘माटी’ बस्तर को किसी “समस्या क्षेत्र” की तरह नहीं दिखाती, बल्कि वहां की असली धड़कन लोगों का साहस और संबंधों की गर्माहट को उभारती है।

