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अबूझमाड़ की बदली तकदीर: कभी 50 किमी पैदल चलकर मिलता था राशन आधा ले जाते थे नक्सली

अब ट्रैक्टर से घर तक पहुंच रही जिंदगी की राहत

नारायणपुर। घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और उफनते नदी-नालों के बीच बसा अबूझमाड़… एक ऐसा इलाका, जो दशकों तक देश के नक्शे पर होते हुए भी विकास की रोशनी से अछूता रहा। यह वही जमीन है, जहां वर्षों तक बंदूक की आवाज ने शासन की आवाज को दबा दिया था, जहां नक्सलियों की समानांतर सरकार चलती थी और जहां एक-एक दाना अनाज भी संघर्ष की कहानी कहता था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है… और यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि ग्रामीणों की आंखों में लौट आई उम्मीद, चेहरे पर आई मुस्कान और जीवन में आई सहजता में साफ झलकता है। अबूझमाड़ का नाम सुनते ही एक ऐसा भूगोल सामने आता है, जहां पहुंचना ही किसी चुनौती से कम नहीं। बीते पांच दशकों तक यह इलाका नक्सल प्रभाव के सबसे गहरे साये में रहा। नक्सलियों ने यहां विकास को जड़ से रोक रखा था,सड़क, पुल, स्कूल, राशन दुकान हर सुविधा पर जैसे बंदूक की पहरेदारी थी।यदि कहीं सड़क या पुलिया बनने की कोशिश होती, तो आईईडी लगाकर उसे उड़ा दिया जाता। प्रशासन की पहुंच लगभग शून्य थी और ग्रामीण अपने ही देश में मानो अलग-थलग पड़ गए थे।

सबसे दर्दनाक तस्वीर थी, राशन की

35 किलो चावल के लिए 50 से 60 किलोमीटर का पैदल सफर और 2 से 3 दिन का समय,कंधों पर बोझ, पैरों में छाले और मन में डर,ग्रामीण बताते हैं कि कई बार उन्हें नदी-नाले पार करते हुए जान का जोखिम उठाना पड़ता था। और जब किसी तरह राशन लेकर गांव पहुंचते, तो उसमें से भी लगभग आधा हिस्सा नक्सलियों को देना पड़ता था। यानी भूख से लड़ते इंसान से उसका हक भी छीन लिया जाता था। ऐसा ही एक गाँव है ढोढरबेड़ा जो गवाह है उस दौर का,जिला मुख्यालय से करीब 85 किलोमीटर दूर स्थित ढोढरबेड़ा गांव आज भी उस दर्दनाक अतीत की कहानी अपने भीतर समेटे हुए है।वर्ष 1997-98 में यहां पीडीएस गोदाम बनाया गया था,उम्मीद थी कि गांव आत्मनिर्भर होगा, लोगों को राहत मिलेगी।लेकिन नक्सलियों के बढ़ते दबाव और खतरे के कारण महज दो वर्षों में ही यह गोदाम बंद हो गया। इसके बाद ग्रामीणों को 20 किलोमीटर दूर ओरछा ब्लॉक मुख्यालय तक पैदल जाना पड़ता था। रास्ते में नक्सलियों का डर, वापसी में भारी बोझ और अंत में उस राशन का भी एक बड़ा हिस्सा नक्सलियों को सौंपना पड़ता था। आज भी ढोढरबेड़ा के पीडीएस गोदाम की दीवारों पर लिखे नक्सली नारे और चुनाव बहिष्कार जैसे संदेश उस काले दौर की खामोश गवाही देते हैं। वहीं सुरक्षा, संकल्प और सिस्टम अचानक बदलाव नहीं आया, इसके पीछे है,सुरक्षा बलों का लगातार बढ़ता दायरा, पुलिस कैंपों की स्थापना, और शासन-प्रशासन की सक्रिय एवं संवेदनशील पहल।केंद्र सरकार की नक्सल मुक्त भारत की रणनीति और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के स्पष्ट संकल्प ने जमीनी स्तर पर असर दिखाना शुरू किया है।

 

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