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हाथरस कांड में आरोपी संदीप को आजीवन कारावास की सजा, कोर्ट ने 3 आरोपियों को किया बरी

हाथरस . हाथरस के बहुचर्चित बूलगढ़ी कांड में गुरुवार को एडीजे विशेष एससी-एसटी त्रिलोक पाल सिंह की कोर्ट से गुरुवार को फैसला आया. घटना के चार में से तीन आरोपियों को बरी कर दिया गया. वहीं, संदीप सिसौदिया को गैर इरादतन हत्या और एससी एसटी एक्ट में दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा व 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है.

मामले की जांच कर सीबीआई ने 18 दिसंबर 2020 को गैंगरेप, हत्या, एससी-एसटी एक्ट में चार्जशीट दाखिल की थी. अभियोजन पक्ष ने 104 गवाह बनाए थे. इनमें से 35 की गवाही कराई गई. इसके अलावा मेडिकल, फॉरेंसिक और पॉलीग्राफी टेस्ट की रिपोर्ट दाखिल की. इधर, बचाव पक्ष की ओर से कोई भी गवाह और साक्ष्य पेश नहीं किया गया.

अदालत में मेडिकल रिपोर्ट, फॉरेंसिक रिपोर्ट में गैंगरेप की पुष्टि नहीं हुई. इधर, गवाहों की गवाही भी टिक नहीं सकी. वादी पक्ष के सभी गवाह बचाव पक्ष की जिरह के दौरान कमजोर साबित हुए.

अदालत के फैसले के विषय में अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता एडीजीसी देवेंद्र यादव व वादी पक्ष की अधिवक्ता सीमा कुशवाह ने बताया कि कोर्ट ने रवि, रामू और लवकुश को बरी कर दिया है. वहीं, चौथे आरोपी संदीप सिसौदिया को आजीवन कारावास, 50 हजार का जुर्माना की सजा सुनाई गई है. इसमें से 40 हजार रुपये पीड़ित पक्ष को देने का आदेश है. उन्होंने कहा, फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट जाएंगे. एक आरोपी को दोषी करार कराने और सजा दिलाने में कामयाब रहे. अन्य के खिलाफ भी इसी फैसले को आधार बनाते हुए अपर कोर्ट जाएंगे.

यह था मामला घटना 14 सितंबर 2020 की है. घटना की शुरुआत में तहरीर के आधार पर पुलिस ने मुकदमा संदीप सिसौदिया उर्फ चंदू के खिलाफ जानलेवा हमले व एससी-एसटी एक्ट में दर्ज किया था. युवती के परिवार वालों के बाद के बयानों के आधार पर मामले में सामूहिक दुष्कर्म की धारा बढ़ाई गई, जिसमें संदीप के परिवार के रवि, रामू और लवकुश को भी आरोपी बनाया गया. घायल युवती की 29 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मौत हो गई थी. मामले के तूल पकड़ने के बाद उप्र सरकार ने जांच सीबीआई को सौंप दी थी.

मृत्यु पूर्व बयान संदेह के आधार पर कोर्ट ने नकारे

घटना के शुरुआती दौर में पुलिस ने लापरवाही पूर्ण विवेचना करने और पीड़िता का मेडिकल कराने से लेकर अन्य विधिक प्रक्रिया अपनाने तक में लचर रवैया अपनाया. वहीं, मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्य लेटलतीफी की वजह से कमजोर होते गए. मजिस्ट्रेटी बयान पीड़िता के मृत्यु पूर्व बयान थे, जो अहम साक्ष्य थे. मगर, अलीगढ़ तहसील में उस वक्त तैनात रहे नायाब तहसीलदार की लापरवाही से यह बयान कोर्ट में संदेहास्पद साबित हुए. इस आधार पर कोर्ट ने इन्हें नकार दिया और तीन आरोपी बरी हो गए.

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