छत्तीसगढ़

अरविंद सिंह ने इंटीग्रेटेड फिश फार्मिंग से खड़ी की 8 लाख से अधिक वार्षिक आय की मिसाल

हैचरी और मछली बीज उत्पादन से बढ़े आय के स्रोत

रायपुर। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में कृषि के साथ मत्स्य पालन जैसी गतिविधियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसका प्रेरक उदाहरण मनेन्द्रगढ़ विकासखंड के ग्राम ताराबहरा निवासी मत्स्य कृषक अरविंद सिंह हैं, जिन्होंने पारंपरिक कृषि से आगे बढ़कर इंटीग्रेटेड फिश फार्मिंग को अपनाया और अपने फार्म को बहुआयामी आजीविका के केंद्र के रूप में विकसित किया। आज उनके फार्म पर मत्स्य पालन के साथ मछली बीज उत्पादन, हैचरी, सूकर एवं कुक्कुट पालन जैसी गतिविधियां संचालित हो रही हैं। इनसे उन्हें लगभग 8 लाख रुपये या उससे अधिक की वार्षिक आय प्राप्त हो रही है, वहीं 15 से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिल रहा है। अरविंद सिंह बताते हैं कि मत्स्य पालन शुरू करने से पहले उनकी आय मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर थी। मेहनत और लागत के अनुरूप अपेक्षित लाभ नहीं मिलने पर उन्होंने आय के अतिरिक्त साधनों की तलाश शुरू की। इसी दौरान उन्होंने मत्स्य पालन को व्यवसाय के रूप में अपनाया और धीरे-धीरे अपने फार्म को इंटीग्रेटेड फिश फार्मिंग मॉडल में विकसित किया। आज उनके फार्म पर 5-6 नर्सरी तालाब, 2 ब्रुडर तालाब तथा स्टाकिंग तालाब संचालित हैं। नर्सरी तालाबों में मत्स्य बीजों का प्रारंभिक पालन, ब्रुडर तालाबों में प्रजनन योग्य मछलियों का रख-रखाव तथा स्टॉकिंग तालाबों में मछलियों का पालन किया जाता है। इस वैज्ञानिक व्यवस्था से उत्पादन प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और प्रभावी हुई है। अरविंद सिंह के फार्म पर स्वयं की मत्स्य हैचरी भी है, जहां विभिन्न प्रजातियों के मत्स्य बीज तैयार किए जाते हैं। यहां इंडियन मेजर कार्प (IMC), एक्सोटिक कार्प सहित अन्य प्रजातियों का पालन किया जाता है। पंगासीयस मछली के स्पिनिंग की सुविधा भी उपलब्ध है। इसके साथ ही उन्होंने कतला मछली में क्रॉस ब्रीडिंग का प्रयास कर मत्स्य उत्पादन में नई संभावनाएं तलाशने की दिशा में कदम बढ़ाया है। फार्म पर पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच और मछलियों के स्वास्थ्य एवं वृद्धि के लिए आवश्यक प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। इससे मत्स्य बीज उत्पादन और मछली पालन दोनों को बेहतर बनाने में मदद मिली है। अरविंद सिंह वर्ष 2022 से मत्स्य विभाग की विभिन्न योजनाओं और तकनीकी मार्गदर्शन का लाभ लेते हुए अपने व्यवसाय को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। वे विभागीय अधिकारियों के संपर्क में रहकर मत्स्य पालन, बीज उत्पादन, हैचरी संचालन, स्पॉनिंग तथा तालाब प्रबंधन जैसे विषयों पर आवश्यक तकनीकी जानकारी प्राप्त करते हैं। विभागीय योजनाओं के अंतर्गत मिले सहयोग के साथ जाल वितरण योजना का लाभ भी उन्हें प्राप्त हुआ है। योजनाओं से मिली सहायता, तकनीकी जानकारी और स्वयं के अनुभव के समन्वय से उन्होंने मत्स्य पालन को व्यवस्थित व्यवसाय का रूप दिया।

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