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हाथी के जिस बच्चे को दया मृत्यु देने की उठ रही थी मांग उसने तोड़ा दम, वन्य संरक्षण कार्यकर्ता नितिन सिंघवी उठाए सवाल

जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रहे जिस जंगली हाथी (Elephant) के बच्चे को दया-मृत्यु देने की मांग की जा रही थी आखिरकार उसने सोमवार को दम तोड़ दिया.अंतिम समय तक वन्य जीव चिकित्सक उसके उपचार में लगे रहे लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका. हाथी के बच्चे को जशपुर जिले के कांसाबेल के जंगल में रखा गया था. यहीं उसका उपचार किया जा रहा था लेकिन स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो पा रहा था.

हाथी के बच्चे को उक्त स्थल से उठाकर कांसाबेल के जंगल में शिफ्ट किया गया था . वहीं पर वन्यजीव विशेषज्ञ उसका उपचार कर रहे थे लेकिन हाथी के स्वास्थ्य में कोई भी सुधार नहीं हो पा रहा था. न तो वह सिर के हिस्से को उठा पा रहा था और न ही करवट बदल पा रहा था.वह भोजन भी नहीं कर पा रहा था. लगातार गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए हाथी को दया मृत्यु देने की मांग भी उठाई जा रही थी .वन्य जीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने उसे दया मृत्य देने की मांग को लेकर वन विभाग के उच्चाधिकारियों को पत्र भी लिखा था.इस पत्र पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका और सोमवार शाम चार बजे हाथी के बच्चे की मौत हो गई.उस दौरान भी वन्य जीव चिकित्सक वहां उपस्थित थे लेकिन चाह कर भी उसकी प्राणरक्षा नहीं की जा सकी.

जशपुर वन मंडल में हाथी के शावक की मौत के बाद रायपुर के वन्य संरक्षण कार्यकर्ता नितिन सिंघवी ने कई सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि वन विभाग ने इस बात की जानकारी किसी को क्यों नहीं दी. ऐसा क्या जादुई इलाज करा रहे थे कि मीडिया तक को भी नहीं जाने दिया गया. इसका जवाब वन विभाग को देना चाहिए. सिंघवी ने कहा कि एक चीज समझ में नहीं आई कि जब रीढ़ की हड्डी टूट गई थी, दोनों पांव में लकवा मार दिया था और जब वन विभाग को भी मालूम था कि वह जिंदा नहीं रह सकेगा तो उसका इलाज क्यों करवाते रहे. क्यों इतनी दर्दनाक मृत्यु दी गई. क्या दर्दनाक मृत्यु देना मानवता है. सात दिन पहले दया मृत्यु के लिए लिखे गए पत्र का संज्ञान क्यों नहीं लिया गया.

हाथी के बच्चे की सोमवार शाम चार बजे मौत हुई है.पिछले 16 दिनों से वन्य जीव चिकित्सकों ,विशेषज्ञों द्वारा उसका उपचार किया जा रहा था.बेहतर से बेहतर उपचार सुविधा उपलब्ध कराई गई लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका.

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